यह व्रत अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र के लिए किया जाता है।
अविवाहित कन्याएँ भी अच्छे पति की प्राप्ति हेतु व्रत रखती हैं।
पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को पति रूप में पाना चाहती थीं।
देवर्षि नारद ने पारवती के पिता हिमालय को भगवान विष्णु से शादी कराने की सलाह दी।
यह सुनकर पार्वती अत्यंत दुखी हुईं और अपनी सखियों के साथ वन में चली गईं।
वन में जाकर उन्होंने शिवलिंग बनाकर निर्जला व्रत किया
और भगवान शिव की कठोर तपस्या आरंभ की।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।